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Thursday, Jan 8, 2026
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भाजपा में नेतृत्व का प्रश्न और कार्यकर्ता की उपेक्षा: आत्ममंथन की जरूरत

लेख:
-सत्येन ओझा

भारतीय जनता पार्टी में नेतृत्व को लेकर विमर्श और भविष्य की तैयारियां शुरू होना एक स्वाभाविक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बाद पार्टी किस दिशा में आगे बढ़ेगी—इस पर चर्चा होना न केवल आवश्यक है, बल्कि स्वस्थ संगठनात्मक संस्कृति का संकेत भी है। भले ही गैर-भाजपा दलों में इस प्रकार का आंतरिक लोकतंत्र प्रायः देखने को न मिलता हो, लेकिन भाजपा में नेतृत्व की यह सतत प्रक्रिया उसकी पहचान का हिस्सा रही है।
मैं स्वयं कभी प्रत्यक्ष रूप से भाजपा का सदस्य नहीं रहा, किंतु संगठन को भीतर से समझने और देखने का अवसर मुझे मिला है। अपने इसी अनुभव के आधार पर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का वैश्विक कद किसी चमत्कार का परिणाम नहीं, बल्कि उनकी असाधारण कार्यक्षमता, स्पष्ट दृष्टि, अनुशासित कार्यशैली और देश के अंतिम व्यक्ति तक संवाद बनाए रखने की क्षमता का स्वाभाविक निष्कर्ष है।
आज भाजपा जिस शिखर पर खड़ी है, उसका श्रेय यदि केवल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दिया जाए, तो यह इतिहास के साथ अन्याय होगा। इस सफलता की नींव बहुत पहले रखी जा चुकी थी। विशेष रूप से पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी के संगठनात्मक योगदान से। अटल बिहारी वाजपेयी की लोकप्रियता और अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता के चरम काल में, आडवाणी जी पार्टी के सबसे छोटे कार्यकर्ता तक संगठन के बीज बो रहे थे। वे भाजपा की जड़ों को सींच रहे थे, जब वे पार्टी के अध्यक्ष थे तब भी और गृहमंत्री होते हुए भी। निस्वार्थ त्याग और निरंतर परिश्रम से।

भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा 1996 में लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव का सामना करते हुए कहा था, ‘आज मेरे कम सांसद होने पर आप (कांग्रेस) हम पर हंस रही है, एक दिन देश आप पर हंसेगा’.उनके इस कथन के पीछे संगठन में आडवाणी जी के प्रति उनका अटूट विश्वास था। आणवाड़ी व वाजपेयी मित्रता केवल व्यक्तिगत नहीं थी, बल्कि संगठनात्मक संतुलन का उदाहरण थी। यदि उस दौर में कार्यकर्ता-आधारित संगठन खड़ा न किया गया होता, तो आज की भाजपा की कल्पना कठिन होती।
यहीं से वर्तमान परिदृश्य को लेकर चिंता जन्म लेती है। जिस भाजपा को मैंने निकट से देखा है, वह ‘टाट-पट्टी उठाने वाले’ समर्पित कार्यकर्ताओं से बनी थी। आज वही भाजपा धीरे-धीरे अपने मूल आधार से दूर होती दिखाई दे रही है। नेतृत्व का एक बड़ा हिस्सा अब सामान्य कार्यकर्ताओं की जगह आर्थिक रूप से सक्षम और संसाधन-संपन्न लोगों के हाथों में केंद्रित होता जा रहा है। यह प्रवृत्ति संगठन की जड़ों को खोखला कर रही है।
एक समय था जब पार्टी का कोई भी कार्यक्रम कार्यकर्ता अपना व्यक्तिगत उत्तरदायित्व समझकर करता था। आज कई जगहों पर वह स्वाभाविक कार्यकर्ता-भीड़ पेशेवर भीड़ से बदल दी गई है। कार्यक्रमों में उपस्थिति के लिए कारखानों के मजदूरों या भाड़े के लोगों पर निर्भरता बढ़ी है। इससे कार्यकर्ता निर्माण की प्रक्रिया लगभग ठहर-सी गई है। नया व्यक्ति संगठन में प्रवेश करते ही स्वयंभू नेता बनकर मंच तक पहुंच जाता है।
जो कभी भाजपा की संस्कृति नहीं रही।
यह कड़वा सच है, और इसे लिखते समय यह आशंका भी है कि इससे पार्टी के कुछ वरिष्ठों को असहजता हो सकती है। किंतु सच कहना आज अधिक आवश्यक है।
भाजपा का शीर्ष नेतृत्व आज अपने वैश्विक कद और राजनीतिक सफलता को देख पा रहा है, लेकिन उसकी नींव में बैठा समर्पित कार्यकर्ता उसकी दृष्टि से ओझल होता जा रहा है। यदि पार्टी की रणनीति केवल नेतृत्व परिवर्तन तक सीमित रही और संगठनात्मक जड़ों की उपेक्षा जारी रही, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सेवानिवृत्त होने के बाद भाजपा के लिए अपना शीर्ष स्थान बनाए रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इतिहास साक्षी है। कांग्रेस को शीर्ष तक पहुंचने में दशकों लगे और पतन में भी काफी समय लगा। लेकिन यदि भाजपा ने अपने कार्यकर्ताओं की अनदेखी जारी रखी, तो उसका पतन अपेक्षाकृत तेज हो सकता है।
इस संदर्भ में पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल रहे कल्याण सिंह का उदाहरण उल्लेखनीय है। राम मंदिर आंदोलन के समय वे भाजपा के सबसे चमकते चेहरों में थे। किंतु भाजपा से अलग होते ही वह चमक विलुप्त हो गई। यह किसी व्यक्ति की विफलता नहीं, बल्कि इस सत्य का प्रमाण था कि भाजपा की ताकत व्यक्ति नहीं, बल्कि संगठन और कार्यकर्ता होते हैं।
आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता कल्याण सिंह से कहीं अधिक व्यापक और वैश्विक है। लेकिन यदि कार्यकर्ता-आधारित संगठन कमजोर हो गया, तो मोदी जी के बाद भाजपा की स्थिरता प्रश्नों के घेरे में आ सकती है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत द्वारा हाल ही में दिया गया संदेश इस दिशा में एक संकेत है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भाजपा में पद पाने की लालसा में संघ में आने वालों को संघ की शाखा से दूरी बना लेनी चाहिए। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था कि संघ भाजपा को नियंत्रित नहीं करता। यह संगठनात्मक आत्मशुद्धि का उदाहरण है, शीर्ष पद पर बैठकर भी संघ प्रमुख डॉ.मोहन भागवत सबसे निचले पायदान पर संगठन की नब्ज को समझ पा रहे हैं। संघ प्रमुख की इस दूर दृष्टिता से भाजपा नेतृत्व को सीख लेने की आवश्यकता है।
समय रहते यदि भाजपा ने अपनी जड़ों, अपने समर्पित कार्यकर्ताओं की ओर ध्यान नहीं दिया, तो वह उसी मोड़ पर खड़ी हो सकती है, जहां से पतन की शुरुआत होती है। हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार के मंत्री एवं अटल आणवाडी के बाद की पंक्ति के वरिष्ठ नेताओं में शुमार कैलाश विजयवर्गीय का एक मीडिया कर्मी के साथ व्यवहार भाजपा के संस्कारों से कतई मेल नहीं खाता, जिस सच को दुनिया ने देखा उस सच को रिकार्ड में लाने वाले एसडीएम को निलंबन भाजपा नेताओं के अहंकार को बढ़ाने वाला आत्मघाती कदम हो सकता है, इसे केन्द्रीय नेतृत्व को गंभीरता से समझने की जरूरत है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज में भाजपा के प्रति असंतोष इसी सोच का परिणाम है, ये असंतोष आने वाले दिनों में गंभीर रूप धारण कर सकता है। आज भी अवसर है, पर आत्ममंथन जरूरी है।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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