
नवीन सूद की कलम से
कभी समाज में शिक्षक को राष्ट्र निर्माता कहा जाता था। उसे ज्ञान का दीपक, संस्कारों का वाहक और भविष्य की पीढ़ी का मार्गदर्शक माना जाता था। लेकिन आज का सरकारी शिक्षक अपने मूल दायित्व से दूर होता जा रहा है। वह अब शिक्षा देने वाला गुरु कम और सरकारी सिस्टम का बंधुआ मजदूर अधिक दिखाई देता है।
विडंबना यह है कि जिस शिक्षक के कंधों पर देश के भविष्य को संवारने की जिम्मेदारी है, उसी शिक्षक को व्यवस्था ने गैर-शैक्षणिक कार्यों के बोझ तले दबा दिया है। विद्यालयों में बच्चों को पढ़ाने के बजाय शिक्षक चुनाव ड्यूटी, जनगणना, सर्वेक्षण, सरकारी योजनाओं के प्रचार-प्रसार, विभिन्न प्रकार की बैठकों और अंतहीन रिकॉर्ड अपडेट करने में लगा हुआ है।
आज किसी भी प्रशासनिक अधिकारी को यदि कोई अतिरिक्त कार्य करवाना हो तो सबसे आसान विकल्प शिक्षक ही दिखाई देता है। आदेश जारी होता है और शिक्षक को अपनी कक्षा छोड़कर सरकारी ड्यूटी निभाने निकलना पड़ता है। सबसे दुखद बात यह है कि इन कार्यों के लिए कोई स्पष्ट और पारदर्शी व्यवस्था भी दिखाई नहीं देती। कई बार अलग-अलग अधिकारी अपनी सुविधा के अनुसार शिक्षकों को बुला लेते हैं, जबकि इसका एक निर्धारित सिस्टम होना चाहिए।
स्थिति यहीं तक सीमित नहीं है। अब डिजिटल शिक्षा के नाम पर शिक्षकों के सिर पर एक और बोझ डाल दिया गया है। स्कूल में पूरे दिन पढ़ाने के बाद उन्हें “साथी ऐप” जैसे प्लेटफॉर्म के माध्यम से ऑनलाइन कक्षाएं भी संचालित करनी पड़ती हैं। सवाल यह है कि क्या शिक्षा केवल ऐप और रिपोर्ट तक सीमित रह गई है? क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की कि शिक्षक आखिर इंसान है या मशीन?
ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की वास्तविकता किसी से छिपी नहीं है। कई घरों में एक ही मोबाइल फोन होता है, जिसे परिवार के कई सदस्य साझा करते हैं। इंटरनेट की समस्या अलग है। ऐसे में ऑनलाइन शिक्षा की योजनाएं कागजों पर तो सफल दिखाई देती हैं, लेकिन जमीन पर उनकी सच्चाई कुछ और ही होती है। जब बच्चा ऑनलाइन कक्षा में शामिल नहीं हो पाता तो नाराजगी अभिभावकों की होती है और उसका सामना शिक्षक को करना पड़ता है।
अभिभावक शिकायत करते हैं कि शिक्षक पढ़ा नहीं रहे, जबकि सच्चाई यह है कि शिक्षक स्वयं व्यवस्था की जटिलताओं में फंसा हुआ है। वह एक ओर अधिकारियों के आदेशों का पालन कर रहा है, दूसरी ओर बच्चों की पढ़ाई की जिम्मेदारी निभाने का प्रयास कर रहा है और तीसरी ओर डिजिटल रिपोर्टिंग के दबाव से जूझ रहा है।
आज शिक्षा व्यवस्था में सबसे अधिक परेशान यदि कोई वर्ग है तो वह शिक्षक, विद्यार्थी और अभिभावक हैं। हैरानी की बात यह है कि जो लोग वातानुकूलित कार्यालयों में बैठकर नई-नई योजनाएं बनाते हैं, वे शायद कभी यह जानने की कोशिश नहीं करते कि उन योजनाओं का वास्तविक प्रभाव जमीन पर क्या पड़ रहा है।
शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए सबसे पहले शिक्षक को उसके मूल कार्य पर लौटाना होगा। यदि शिक्षक को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देनी है तो उसे गैर-शैक्षणिक कार्यों से मुक्त करना होगा। उसे बार-बार कक्षा से बाहर निकालकर दूसरे कार्यों में लगाने की प्रवृत्ति पर रोक लगानी होगी। डिजिटल शिक्षा को भी जमीनी परिस्थितियों के अनुरूप बनाना होगा, न कि केवल आंकड़ों और रिपोर्टों की सफलता तक सीमित रखना होगा।
एक राष्ट्र तभी मजबूत बनता है जब उसका शिक्षक सम्मानित और स्वतंत्र हो। लेकिन यदि शिक्षक स्वयं व्यवस्था के बोझ तले दबा रहेगा, तो शिक्षा का स्तर सुधारने के सारे दावे केवल भाषणों और सरकारी दस्तावेजों तक सीमित रह जाएंगे।
आज जरूरत इस बात की है कि शिक्षक की व्यथा को सुना जाए, समझा जाए और उसके समाधान के लिए गंभीर प्रयास किए जाएं। क्योंकि जब शिक्षक पढ़ाने से अधिक सिस्टम को संतुष्ट करने में व्यस्त हो जाए, तब समझ लेना चाहिए कि शिक्षा व्यवस्था कहीं न कहीं अपने मूल उद्देश्य से भटक चुकी है।
शिक्षक को फिर से शिक्षक बनने दीजिए।
उसे सिस्टम का बंधुआ मजदूर नहीं, राष्ट्र निर्माता बनने दीजिए।
— नवीन सूद


