-सभी राजनीतिक दल व पार्षद शहर हित छोड़ निजी राजनीतिक रोटियां सेंकने में जुटे
-जनता के साथ हर कदम पर ज्यादातर पार्षदों ने किया छल, अब भरोसे लायक नहीं बचे
-पहले भी शहर हित के बजाय निजी हित में फैसले हुए, अब भी कुछ लोग पर्दे के पीछे हैं सक्रिय
सत्येन ओझा, मोगा (द बीट्स न्यूज)
नगर निगम के मेयर के चुनाव के लिए 19 जनवरी निश्चिच होते ही राजनीतिक सरगर्मियां शुरू हो गई हैं। 50 वार्डों वाली नगर निगम के पास इस समय किस पार्टी के पास कितनी सीटें हैं, ये सही आंकड़ा अभी तक किसी भी पार्टी के पास नहीं है। फरवरी 2021 में हुए नगर निगम के चुनाव में उस समय राज्य की सत्ता में आसीन कांग्रेस ने 20, शिरोमणि अकाली दल ने 15, आजाद 10, आम आदमी पार्टी ने चार, भाजपा ने एक सीट पर चुनाव जीता था।
बाद में कांग्रेस पार्टी ने सभी आजाद प्रत्याशियों का विश्वास हासिल कर कांग्रेस की टिकट पर चुनाव जीतीं नीतिका भल्ला को मेयर बनाने में कामयाबी हासिल की थी। नीतिका भल्ला पहली ऐसी मेयर साबित हुईं जिन्होंने मेयर पद के लोकतांत्रिक मूल्यों को बहाल करते हुए सदन की बैठकों में सभी वार्ड के पार्षदों के प्रस्ताव निगम की बैठक में शामिल कर उन्हें मंजूर कराया था, पहली बार सदन में ऐसा हुआ था कि कोई पार्षद ये शिकायत नहीं कर पाया था कि उनके वार्ड के जरूरी काम हाउस की बैठक में शामिल न हुए हों या मंजूर न हुए हों, लेकिन कुछ पार्षदों को छोड़ दिया जाय तो शहर में शुरू हुई ये परंपरा भी कुछ पार्षदों को रास नहीं आई। उन्होंने शहर हित को छोड़कर निजी हितों के लिए काम किया और नीतिका भल्ला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास कराने में आम आदमी पार्टी का सहयोग किया, अविश्वास प्रस्ताव पर 43 पार्षदों ने हस्ताक्षर किये थे, जिनमें कांग्रेस, भाजपा व शिरोमणि अकाली दल के पार्षदों के हस्ताक्षर भी शामिल थे, कोई पार्टी अपने पार्षदों पर नियंत्रण नहीं रख सकी। कांग्रेस ने जरूर छह पार्षदों को निलंबित कर दिया था, लेकिन बाद में ये आदेश भी कागजी साबित हुए। अन्य किसी पार्टी ने अपने किसी पार्षद के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की थी। यानी पार्षदों के साथ ही राजनीतिक पार्टियों ने भी उस समय जनता का विश्वास खो दिया है, कोऊ पार्टी भरोसे लायक नहीं बची। उसका परिणाम ये हुआ कि चार पार्षदों वाली आम आदमी पार्टी 21 अगस्त 2023 को बलजीत सिंह चानी को मेयर बनाने में कामयाब रही, लेकिन चानी ढाई साल का भी समय पूरा नहीं कर सके, आम आदमी पार्टची ने ने मेयर पद से उनका इस्तीफा लेकर पार्टी से ही निकाल दिया।
मेयर पद के चुनाव 19 जनवरी को होने हैं, लेकिन इस समय स्थिति ये है कि किसी भी पार्षद पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता है कि इन चुनावों में उनकी रणनीति क्या रहेगी न ही किसी पार्टी पर भरोसा किया जा सकता है। सिर्फ आम आदमी पार्टी जरूर अपनी प्रतिष्ठा बचाने में जुटी है।मेयर पद का चुनाव जीतने के लिए 27 पार्षद होना जरूरी है, ये संख्या फिलहाल आम आदमी पार्टी के पक्ष में ही दिख रही है।
हालांकि पर्दे के पीछे जो खेल चल रहा है, उसमें कांग्रेस की भूमिका मुख्य है, उसके साथ अकाली दल आएगा कहना मुश्किल है। लेकिन कुछ विद्रोही पार्षद जो साल 2023 में मेयर के चुनाव में धोखा खा चुके हैं वह भी पर्दे के पीछे अपना काम कर रहे हैं। कुछ लोगों ने पर्दे के पीछे ही रहकर अनुसूचित जाति का शिगूफा छोड़ दिया है, एक जाति विशेष का मेयर बनने से शहर को क्या फायदा होगा, इसका जबाव उनके पास भी नहीं है। लेकिन वर्तमान में जो स्थिति दिख रही है कि उसमें आम आदमी पार्टी का ही मेयर बनता दिख रहा है। क्योंकि वर्तमान स्थिति में किसी भी पार्टी या पार्षद के के पास जनता के सामने ये कहने को नहीं है कि उस पर भरोसा किया जा सकता है, क्योंकि कदम दर कदम वे जनता का भरोसा तोड़ते रहे हैं।समस्याओं से जूझ रही जनता का विश्वास जीतने में हर पार्टी नाकाम साबित हुई है।
द बीट्स न्यूज नेटवर्क
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