
-निगम चुनाव की घोषणा वाले दिन एसई तबादला कराकर रिलीव भी हो गए
-रेगूलर अधिकारियों में सिर्फ एसडीओ स्तर के अधिकारी ही निगम में पहुंचे
-निगम कमिश्नर अब प्रशासक का पद खाली, अतिरिक्त चार्ज एसडीएम धर्मकोट के पास
-दोनों एसई, ज्वाइंट कमिश्नर, सहायक कमिश्नर, एक्सईएन के पद पहले से ही हैं खाली
सत्येन ओझा.द बीट्स न्यूज
मोगा। लगभग 100 करोड़ सालाना बजट वाले ए कैटगरी की मोगा नगर निगम एक बार फिर अधिकारी विहीन हो गई है। ये स्थिति निगम चुनाव के ऐन मौके पर पैदा हुई है। निगम कमिश्नर का अतिरिक्त कार्यभार दो दिन पहले ही निगम चुनाव की घोषणा से कुछ घंटे पहले ही आईएएस अधिकारी जसपिंदर सिंह से लेकर धर्मकोट के एसडीएम पीसीएस अधिकारी गुरविंदर सिंह जौहल को सौंपा गया है। निगम कमिश्नर का रेगूलर पद लंबे समय से खाली चल रहा है।
निगम कमिश्नर जसपिंदर सिंह से अतिरिक्त चार्ज छीने जाने के साथ ही निगम के एक मात्र एसई (एक्जीक्यूटिव इंजीनियर रंजीत सिंह ने भी तबादला कराकर दो दिन पहले ही रिलीव हो गये। बताया जा रहा है कि पुरानी दाना मंडी में खोखों के लिए शेड डाले जाने व प्रताप रोड पर सुंदरीकरण के नाम पर हो रहे नियमों के उल्लंघन का मामला विवादों में आने के बाद एसई रंजीत सिंह ने अपना तबादला करा लिया। एसई के निगम में दो पद हैं, अब दोनों ही पद खाली हो गये हैं। ज्वाइंट कमिश्नर व सहायक कमिश्नर के पद पहले से ही खाली हो गई हैं। दो एक्सईएन के पद हैं, दोनों खाली हैं। एक्सईएन रमन के पास मोगा का अतिरिक्त चार्ज है, वे सिर्फ सप्ताह में दो दिन मोगा में बैठते हैं। निगम अधिकारियों के शीर्ष सभी पांच पद खाली चल रहे हैं।
निगम का कार्यकाल 12 मई को समाप्त होने के बाद अब मेयर का पद भी काली हो चुका है।
ऐसे में निगम कमिश्नर के रूप में अतिरिक्त कार्यभार संभालने वाले एसडीएम धर्मकोट गुरविंदर सिंह जौहल अब निगम के कार्यकारी प्रशासक बन गये हैं। निगम के रेगूलर अधिकारियों में अब सही मायने में सर्वोच्च अधिकारी एसडीओ स्तर के ही रह गये हैं, जो काफी निचले पायदान पर हैं। निगम की ओर से पुरानी दाना मंडी में वेंडर पॉलिसी लागू किये जाने के बजाय वहां करीब पौने दो करोड़ से शेड डालने का काम चल रहा है, जहां शेड डाला जा रहा है वहां नगर निगम की जगह पर कुछ माफियाओं का कब्जा है, वहां खोखे लगाने वालों का कहना है कि उनसे एक आढ़ती मासिक किराया वसूलता है। यानि जगह सरकारी है, लेकिन कमाई कोई आढ़ती कर रहा है, ऐसे में सवाल उठता है कि क्या शेड निगम की जगह पर अवैध कब्जा कर कमाई करने वालों के लिए डाले जा रहे हैं, क्योंकि वेंडर पॉलिसी लागू होती तो निगम में खोखे वालों के नाम से प्रस्ताव पास होना जरूरी था। मामला सुर्खियों में आने के बाद वरिष्ठ अधिकारियों ने इस योजना से कदम ही नहीं खींच लिया, समय रहते अपना तबादला कराना ही उचित समझा।
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