
लेख:सत्येन ओझा
पुरानी डायरी के कुछ पन्ने पलटने की जरूरत इसलिए पड़ी, क्योंकि आज लोकतंत्र, संविधान और संस्थाओं की दुहाई देने वालों के सामने इतिहास के कुछ ऐसे सवाल खड़े करना जरूरी है, जिन्हें राजनीतिक सुविधा के अनुसार भुला दिया जाता है।
राहुल गांधी जब हाथों में संविधान की प्रतियां लेकर लोकतंत्र खतरे में होने का दावा करते हैं, तब मन में एक सवाल जरूर उठता है—क्या संविधान केवल विपक्ष में रहते हुए ही याद आता है? क्या संविधान की मर्यादा, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और कानून का सम्मान सत्ता में रहते हुए भी उतना ही महत्वपूर्ण नहीं होता?
मैंने लंबे समय तक इन राजनीतिक बयानों पर कलम नहीं चलाई। लेकिन जब चुनाव आयोग की एसआईआर प्रक्रिया को लेकर राहुल गांधी ने वोट चोरी के आरोप लगाए, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से मुलाकात की और कथित चुनावी अनियमितताओं के सबूत देने की बात कही, तब यह सवाल स्वाभाविक था कि लोकतंत्र में आरोपों की गंभीरता का निर्धारण भाषणों से नहीं, बल्कि तथ्यों और प्रमाणों से होना चाहिए। राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि वे सबूत देने को तैयार हैं। ऐसे गंभीर आरोपों पर देश को राजनीतिक नारों के बजाय प्रमाण और जवाबदेही चाहिए। India Today
लेकिन मेरी कलम उस समय भी नहीं उठी, जब दिल्ली के रामलीला मैदान में 1 नवंबर 2026 को आयोजित रैली को लेकर व्यापारिक संगठनों ने दीपावली के आसपास बाजारों में कारोबार प्रभावित होने की आशंका जताई। व्यापारियों ने रैली स्थगित करने की अपील भी की थी। राहुल गांधी ने लोगों से रैली के साथ बाजारों में खरीदारी करने की अपील की और बाद में कनॉट प्लेस की दुकानें बंद होने को लेकर भाजपा पर आरोप लगाया। सवाल किसी राजनीतिक दल का नहीं, बल्कि उस आम व्यापारी का है, जिसकी रोजी-रोटी राजनीतिक कार्यक्रमों के बीच प्रभावित हो सकती है। लोकतांत्रिक विरोध का अधिकार महत्वपूर्ण है, लेकिन नागरिकों की आर्थिक परेशानियों के प्रति संवेदनशीलता भी उतनी ही जरूरी है। The New Indian Express +2
यहीं से मेरी पुरानी डायरी के पन्ने खुलते हैं।
2 जुलाई 1995 का तंदूर हत्याकांड केवल एक जघन्य हत्या नहीं थी, बल्कि राजनीतिक रसूख और अपराध के रिश्ते पर गंभीर सवाल खड़े करने वाली घटना थी। दिल्ली युवा कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सुशील शर्मा ने अपनी पत्नी नैना साहनी की गोली मारकर हत्या कर दी। इसके बाद शव को अपनी कार में रखकर बगिया रेस्टोरेंट ले गया और मैनेजर केशव कुमार की मदद से तंदूर में जलाने का प्रयास किया। पुलिस की सतर्कता से इस भयावह अपराध का खुलासा हुआ।
सोचिए, आरोपी कोई सामान्य व्यक्ति नहीं, बल्कि सत्तारूढ़ राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ा एक युवा नेता था। निचली अदालत ने उसे फांसी की सजा सुनाई, हाईकोर्ट ने बरकरार रखा और 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे उम्रकैद में बदल दिया। दिसंबर 2018 में 23 वर्षों से अधिक जेल में रहने के बाद उसे रिहा कर दिया गया। यह मामला आज भी याद दिलाता है कि राजनीतिक पहचान किसी अपराध को छोटा नहीं कर सकती। Business Standard
अब आइए शाहबानो प्रकरण पर।
1985 में सुप्रीम कोर्ट ने 62 वर्षीय शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के पक्ष में ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 125 धर्म से ऊपर उठकर जरूरतमंद तलाकशुदा महिलाओं को संरक्षण देती है। लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार ने राजनीतिक और धार्मिक दबाव के बीच 1986 में मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम पारित कर दिया।
यह केवल एक कानून बनाने का मामला नहीं था। यह सवाल था कि क्या किसी महिला को न्याय दिलाने वाले सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के सामने राजनीतिक दबाव को प्राथमिकता दी जा सकती है? हालांकि बाद में 2001 में डेनियल लतीफी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 1986 के कानून की ऐसी व्याख्या की, जिससे महिलाओं के भविष्य के भरण-पोषण के अधिकार को संरक्षण मिला। फिर भी राजीव गांधी सरकार का यह राजनीतिक निर्णय भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक बड़ी बहस का विषय बना रहा। Indian Kanoon +1
सूर्यनेली सामूहिक दुष्कर्म मामला (1996) भी देश की अंतरात्मा को झकझोरने वाला था। केरल की महज 16 वर्षीय लड़की को अगवा करके लगभग 40 दिनों तक अलग-अलग स्थानों पर ले जाकर कई लोगों ने उसका यौन शोषण किया। इस मामले में न्यायिक प्रक्रिया वर्षों तक उलझी रही। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपियों की रिहाई के खिलाफ मामले को दोबारा देखने का रास्ता खोला और 2014 में केरल हाईकोर्ट ने मुख्य आरोपी को उम्रकैद तथा अन्य दोषियों को अलग-अलग सजाएं सुनाईं। यह घटना बताती है कि पीड़िता को न्याय मिलने में वर्षों की देरी भी व्यवस्था की एक गंभीर विफलता है। India News – Times of India +1
निर्भया कांड (2012) को भी कौन भूल सकता है? देश की राजधानी दिल्ली में चलती बस में 23 वर्षीय युवती के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया और बाद में उसकी मौत हो गई। पूरे देश में आक्रोश उमड़ा। तत्कालीन मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को महिलाओं की सुरक्षा और आपराधिक न्याय व्यवस्था पर कठोर सवालों का सामना करना पड़ा। जनआक्रोश के बाद जस्टिस वर्मा समिति गठित हुई और 2013 में आपराधिक कानून में व्यापक संशोधन किए गए। यह स्वीकार करना होगा कि उस समय सरकार ने कानून में बदलाव भी किए, लेकिन यह भी सच है कि इतने बड़े जनआंदोलन के बाद ही व्यवस्था को तेजी से कदम उठाने पड़े। PRS Legislative Research +1
इन घटनाओं का उल्लेख करने का उद्देश्य यह नहीं कि हर अपराध के लिए किसी एक राजनीतिक दल को सीधे जिम्मेदार ठहरा दिया जाए। अपराधी की राजनीतिक सदस्यता और सरकार की संस्थागत जिम्मेदारी दो अलग-अलग बातें हैं। लेकिन जब किसी दल का नेता अपराध में दोषी पाया जाता है, जब किसी पीड़िता के न्याय के रास्ते में राजनीतिक निर्णय बाधा बनते हैं, तब उस दल के नेतृत्व से सवाल पूछना लोकतंत्र का अधिकार है।
आज कांग्रेस संविधान की रक्षा की बात करती है। निश्चित रूप से संविधान की रक्षा हर नागरिक और हर राजनीतिक दल का दायित्व है। लेकिन संविधान केवल हाथ में लेकर लहराने की वस्तु नहीं है। उसकी आत्मा न्याय, समानता, स्वतंत्रता और जवाबदेही में बसती है।
मेरा सवाल राहुल गांधी से भी है और कांग्रेस के उन तमाम नेताओं से भी, जो आज लोकतंत्र के सबसे बड़े पहरेदार होने का दावा करते हैं—क्या आप अपने राजनीतिक इतिहास के इन कठिन अध्यायों पर भी उतनी ही ईमानदारी से बात करने को तैयार हैं? क्या शाहबानो को मिले न्याय के बाद उसे कमजोर करने वाले कानून पर आत्ममंथन करेंगे? क्या तंदूर कांड जैसे मामलों में राजनीतिक रसूख से जुड़े लोगों के अपराधों पर भी उतनी ही मुखरता दिखाएंगे?
लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं है, लेकिन सवालों से बचना जवाबदेही का विकल्प भी नहीं हो सकता।
देश को केवल संविधान की प्रतियां उठाने वाले नेता नहीं चाहिए, बल्कि संविधान की भावना का सम्मान करने वाला राजनीतिक आचरण चाहिए। इतिहास की पुरानी फाइलें बंद करने से इतिहास बदल नहीं जाता। सत्ता बदल सकती है, विपक्ष बदल सकता है, चेहरे बदल सकते हैं, लेकिन न्याय और जवाबदेही के सिद्धांत नहीं बदलने चाहिए।
क्योंकि संविधान किसी पार्टी की जागीर नहीं, 140 करोड़ देशवासियों का विश्वास है।
नोट: लेख में पुराने मामलों को ऐतिहासिक संदर्भ के रूप में रखा गया है। किसी आरोपी की व्यक्तिगत दोषसिद्धि को पूरी कांग्रेस सरकार की आपराधिक संलिप्तता नहीं माना गया है। इससे लेख के तथ्य और तर्क अधिक टिकाऊ रहेंगे।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)
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