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Monday, Jun 1, 2026
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कांग्रेस, भाजपा, शिअद के अरमानों पर झाड़ू फिरी, आम आदमी पार्टी की बहुमत के साथ वापसी

-कांग्रेस 20 से 7, शिअद 15 से तीन पर सिमटी, भाजपा संख्या बढ़ाकर भी निजी लड़ाई में दुर्गति करा बैठी
-खुद को दिग्गज बताने वाला कांग्रेस, भाजपा के नेता अपने ही गढ़ में प्रत्याशियों को जिताने में फेल हुए

सत्येन ओझा.द बीट्स न्यूज
मोगा। मोगा नगर निगम के चुनाव परिणामों में आम आदमी पार्टी का भारी बहुमत के निगम की सत्ता में वापसी ने साफ संकेत दे दिया है कि इस जीत में कहीं न कहीं भाजपा व कांग्रेस का भी बड़ा सहयोग रहा है। विकास के नाम पर जिस तरह से पिछले तीन सालों में मोगा नगर निगम जख्म मिले हैं, जनता का दर्द बढ़ा है, उसके खिलाफ केन्द्र की सत्ता में काबिज भाजपा व राष्ट्रीय स्तर की कांग्रेस पार्टी जनता की आवाज उठाने में फेल ही साबित नहीं हुई है, बल्कि सत्ता के सामने समर्पण साफ दिख रहा है। ये स्थिति तब है जब पंजाब विधानसभा चुनाव में अब सिर्फ आठ महीने बाकी हैं। ये दोनों दल सत्ता के सपने दो देख रही हैं, लेकिन मोगा जिले की राजनीति की बात करें तो जनता की आवाज बनने का माद्दा दोनों ही दलों में नहीं बचा है।कांग्रेस पार्टी ने साल 2021 के निगम चुनाव में 20 सीटें हासिल की थीं, अकाली दल को 15, 10 आजाद प्रत्याशी, आम आदमी पार्टी को सिर्फ 3 सीटें जबकि भाजपा को एक सीट मिली थी। कांग्रेस पिछली बार के मुकाबले आधी सीट भी हासिल नहीं कर सकी, सिर्फ 7 सीटों पर सिमट गई। आम आदमी पार्टी से तीन से 30 के आंकड़े पर पहुंच गई। भाजपा ने एक सीट हासिल की थी, वर्तमान में तीन सीटें भाजपा ने हासिल की हैं, सामान्य भाषा में इसे तीन गुना ज्यादा सीटें मान सकते हैं, लेकिन राजनीतिक दृष्ठि से देखा जाय तो भाजपा की ये दुर्गति के अलावा कुछ और नहीं है। ये दुर्गति किसी और से नहीं बल्कि भाजपा के नेताओं ने खुद अपने हाथों से की है। निजी रूप से वर्चस्व की आपसी लड़ाई में भाजपा नेताओं ने भाजपा को हरा दिया। जिस समय भाजपा ने एक सीट जीती थी, तब किसान आंदोलन के दौरान भाजपा का जबरदस्त विरोध था। आज हालात अलग हैं, अब भाजपा ग्रामीण क्षेत्र में अपनी बैठ बना चुकी है, मोगा तो शहरी क्षेत्र है, जहां संघ की सक्रियता सबसे ज्यादा है। हाल ही में भाजपा के केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने सफल रैली कर पंजाब के राजनीतिक हलके में बेचैनी पैदा कर दी थी, लेकिन गृहमंत्री के उस जज्बे को खुद भाजपा के नेताओं ने मिट्टी में मिला दिया। चिंता की बात तो ये है कि जो नेता खुद को बड़ा नेता साबित करने की होड़ में लगे हैं, वे अपने ही गढ़ में अपने प्रत्याशियों को जिताने में फेल हो चुके हैं, पार्टी के प्रतिद्धंदियों से रिजल्ट मांगने वाले नेता अपना रिजल्ट देने में फ्लॉप हो गये हैं, तीन में से दो सीटें सितारी परिवार की वे सीटें हैं जिन्हें पिछले चुनाव में किसान आंदोलन के दौरान भी इस परिवार ने जीतकर दिखाया है, इसइस जीत में भाजपा का कोई नेता श्रेय लेता है तो ये अपनी झेंप मिटाने से ज्यादा कुछ नहीं है। दो प्रत्याशी जीतते जीतते हार गये, री काउंटिंग में सीटें छिन गईं, खुद को दिग्गज कहने वाला कोई नेता हार के बाद मिली जीत का कारण जानने तक नहीं पहुंचा।यही स्थिति कांग्रेस की भी रही, कांग्रेस के भी दिग्गज नेता अपने ही अपने घर में ही हार गये, अपने प्रत्याशियों को चुनाव जिताने में नाकाम रहे।

द बीट्स न्यूज नेटवर्क
7087570105

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