धर्म का सार जाति-पंथ नहीं, जीवन में धारण करने योग्य संस्कार हैं: आचार्य सुनील शास्त्र

धर्म जागरण समन्वय की मासिक गोष्ठी
विजयादशमी के महत्व, नैतिक मूल्यों और सनातन संस्कृति के संरक्षण पर हुआ मंथन
द बीट्स न्यूज
मोगा। जीवन में संस्कारों का अभाव आज समाज के सामने सबसे बड़ी चिंताओं में से एक है। धर्म का वास्तविक स्वरूप किसी जाति, सम्प्रदाय या पंथ तक सीमित नहीं, बल्कि सत्य, सदाचार और मानवीय मूल्यों को अपने जीवन में धारण करना है। यह विचार धर्म जागरण समन्वय की ओर से विजयादशमी विषय पर आयोजित मासिक गोष्ठी में मुख्य वक्ता आचार्य सुनील कुमार शास्त्री ने व्यक्त किए।
आचार्य सुनील कुमार शास्त्री ने कहा कि धर्म का वास्तविक अर्थ केवल धार्मिक परंपराओं का पालन करना नहीं, बल्कि उन आदर्शों को जीवन में उतारना है, जो व्यक्ति को बेहतर इंसान बनाते हैं। संस्कार मनुष्य के चरित्र और व्यवहार की नींव हैं। जब जीवन से नैतिक मूल्य और संस्कार कमजोर पड़ने लगते हैं, तो इसका प्रभाव परिवार से लेकर पूरे समाज पर दिखाई देने लगता है। इसलिए आवश्यक है कि नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ते हुए उनमें कर्तव्य, अनुशासन और सदाचार की भावना विकसित की जाए।
विजयादशमी के महत्व पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने जय और विजय के अंतर को भी प्रभावशाली ढंग से समझाया। उन्होंने इस पर्व के संदेश को जीवन में अच्छाई, नैतिकता और सकारात्मक विचारों को अपनाने की प्रेरणा से जोड़ते हुए कहा कि त्योहारों की वास्तविक सार्थकता तभी है, जब उनके आदर्श हमारे आचरण का हिस्सा बनें।
सनातन संस्कृति हमारी असली पूंजी: सुरेश मेहंदीरत्ता
गोष्ठी के मुख्य अतिथि एवं नेस्ले इंडिया की मोगा फैक्ट्री के सेवानिवृत्त अधिकारी सुरेश मेहंदीरत्ता ने अपने स्वरचित गीत ‘अब तो जागो’ के माध्यम से सनातन संस्कृति के महत्व को प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि आधुनिक जीवन की व्यस्तता के बीच अपनी सांस्कृतिक जड़ों और पारिवारिक संस्कारों को भूलना गंभीर चिंता का विषय है। समाज को समय रहते जागरूक होकर अपनी विरासत को सुरक्षित रखने के लिए प्रयास करने होंगे।
उन्होंने कहा कि हमारी संस्कृति केवल परंपराओं और रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारी पहचान और जीवन मूल्यों का आधार है। संस्कृति हमारी असली पूंजी है और परिवार उसके संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने की सबसे महत्वपूर्ण इकाई है। यदि परिवारों में सांस्कृतिक मूल्यों का महत्व कम होता गया, तो इसका असर समाज की संरचना पर भी पड़ेगा। उन्होंने लोगों से सनातन संस्कृति के आदर्शों को समझने और उन्हें अपने जीवन में अपनाने का आह्वान किया।
सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन ही अध्यक्षता का वास्तविक अर्थ: अजय सिंगला
गोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया के सेवानिवृत्त प्रबंधक अजय सिंगला ने कहा कि किसी कार्यक्रम की अध्यक्षता करना केवल सम्मान की बात नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। समाज जब किसी व्यक्ति को दायित्व सौंपता है, तो उसके निर्णयों और कार्यों में समाज तथा राष्ट्र का हित सर्वोपरि होना चाहिए। उन्होंने सामाजिक जीवन में जिम्मेदारी, समर्पण और जनहित की भावना को आवश्यक बताया।
इससे पूर्व मुख्य वक्ता आचार्य सुनील कुमार शास्त्री, मुख्य अतिथि सुरेश मेहंदीरत्ता और अध्यक्ष अजय सिंगला ने भारत माता के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर गोष्ठी का शुभारंभ किया।
गोष्ठी में धर्म के वास्तविक मर्म, संस्कारों की आवश्यकता और सनातन संस्कृति के संरक्षण पर विचार रखते हुए यह संदेश दिया गया कि धर्म की पहचान व्यक्ति के आचरण, संस्कारों और कर्तव्यनिष्ठा से होती है। अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझना, नैतिक मूल्यों को अपनाना और उन्हें अगली पीढ़ी तक पहुंचाना ही संस्कारवान समाज के निर्माण का आधार है।
द बीट्स न्यूज नेटवर्क
7087570105

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