आगरा में एमडीआर टीबी के इलाज में बड़ी कामयाबी, अब छह माह में पूरा होगा उपचार

18 माह के लंबे इलाज की जगह बीपाल-एम रेजिमेन से छह माह में उपचार का विकल्प
आगरा के पायलट प्रोजेक्ट में 92 प्रतिशत रही सफलता दर, मरीजों के लिए नई उम्मीद
द बीट्स न्यूज
आगरा। टीबी मुक्त भारत अभियान के तहत आगरा से एक राहत भरी खबर सामने आई है। दवा प्रतिरोधी टीबी यानी एमडीआर टीबी से जूझ रहे पात्र मरीजों को अब लंबे समय तक दवाएं खाने की परेशानी से राहत मिल सकती है। आगरा में बीपाल-एम (BPaLM) रेजिमेन के जरिए इस बीमारी का उपचार किया जा रहा है। इस पद्धति की खासियत यह है कि पात्र मरीजों का इलाज लगभग छह माह में पूरा किया जा सकता है, जबकि पहले प्रचलित उपचार में करीब 18 माह तक दवाएं लेनी पड़ सकती थीं।
जिला क्षय रोग अधिकारी डॉ. सुखेश गुप्ता के अनुसार, आगरा में अक्टूबर 2021 से सितंबर 2024 तक इस पद्धति को लेकर पायलट प्रोजेक्ट चलाया गया था। इसमें 220 पुरुषों और 190 महिलाओं सहित कुल 410 पात्र मरीजों का उपचार किया गया। विभाग के मुताबिक, इस परियोजना में उपचार की सफलता दर 92 प्रतिशत रही। इसके बाद 24 मार्च 2025 से आगरा में एमडीआर टीबी के पात्र मरीजों का इलाज इस पद्धति से किया जा रहा है।
मरीजों को क्या होगा फायदा?
बीपाल-एम रेजिमेन से एमडीआर टीबी के उपचार की अवधि कम होने के साथ मरीजों को कई तरह की सहूलियत मिल सकती है।
– कम समय में उपचार: लंबे समय तक चलने वाले इलाज की जगह पात्र मरीजों का उपचार लगभग छह माह में पूरा हो सकता है।
– दवाओं का बोझ कम: विभागीय जानकारी के अनुसार, इस पद्धति में रोजाना चार गोलियां लेने की व्यवस्था है। इससे लंबे समय तक कई दवाएं लेने की परेशानी कम हो सकती है।
– इंजेक्शन से राहत: यह पूरी तरह मुंह से ली जाने वाली दवाओं पर आधारित उपचार पद्धति है, इसलिए इसमें नियमित उपचार के लिए इंजेक्शन की जरूरत नहीं होती।
– दिनचर्या में आसानी: इलाज की अवधि कम होने से मरीजों और उनके परिवारों पर लंबे उपचार से जुड़ा समय और देखभाल का बोझ कम हो सकता है।
– इलाज पूरा करने में मदद: अपेक्षाकृत कम अवधि का उपचार मरीजों के लिए निर्धारित दवाओं का पूरा कोर्स जारी रखना आसान बना सकता है।
हालांकि, हर मरीज के लिए यह उपचार उपयुक्त नहीं होता। दवाओं का चयन और उपचार की अवधि मरीज की स्थिति, जांच रिपोर्ट तथा चिकित्सकीय दिशानिर्देशों के अनुसार तय की जाती है।
चार दवाओं के संयोजन से होगा उपचार
डॉ. सुखेश गुप्ता के अनुसार, बीपाल-एम रेजिमेन में चार दवाओं का संयोजन शामिल है—बेडाक्विलीन, प्रीटोमैनिड, लाइनजोलिड और मोक्सीफ्लॉक्सासिन। इन दवाओं का इस्तेमाल निर्धारित चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के अनुसार किया जाता है।
एमडीआर टीबी के पुराने उपचार में मरीजों को लंबे समय तक कई दवाएं लेनी पड़ सकती थीं। नई पद्धति का उद्देश्य प्रभावी उपचार को कम अवधि में पूरा करना और मरीजों के लिए इलाज को अधिक सुविधाजनक बनाना है। उपचार के दौरान नियमित चिकित्सकीय निगरानी जरूरी है, क्योंकि दवाओं के दुष्प्रभाव हो सकते हैं और जरूरत के अनुसार जांच भी करानी पड़ती है।
क्या है एमडीआर टीबी?
मल्टी ड्रग रेजिस्टेंट ट्यूबरकुलोसिस (एमडीआर टीबी) टीबी का ऐसा रूप है, जिसमें बीमारी पैदा करने वाले बैक्टीरिया पर कम से कम दो प्रमुख दवाएं—आइसोनियाजिड और रिफैम्पिसिन—असर नहीं करतीं। ऐसे में सामान्य टीबी की तुलना में उपचार अधिक जटिल हो सकता है।
टीबी की दवाएं अनियमित रूप से लेने या डॉक्टर की सलाह के बिना इलाज बीच में छोड़ने से दवा प्रतिरोध विकसित होने का खतरा बढ़ सकता है। इसलिए मरीजों को निर्धारित उपचार पूरा करना चाहिए और किसी भी परेशानी की स्थिति में अपने चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज
– दो सप्ताह या उससे अधिक समय तक खांसी रहना।
– खांसी में बलगम या खून आना।
– लगातार बुखार या रात में पसीना आना।
– बिना स्पष्ट कारण वजन कम होना या भूख न लगना।
– लगातार कमजोरी और थकान महसूस होना।
ऐसे लक्षण दिखाई देने पर जांच कराना जरूरी है। केवल लक्षणों के आधार पर एमडीआर टीबी की पुष्टि नहीं की जा सकती; इसके लिए चिकित्सकीय जांच और आवश्यक परीक्षण कराए जाते हैं।
टीबी मुक्त भारत अभियान को मिलेगी मजबूती
मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. अरुण कुमार श्रीवास्तव के अनुसार, बीपाल-एम पद्धति टीबी मुक्त भारत अभियान के लिए एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इससे पात्र एमडीआर टीबी मरीजों को कम अवधि में उपचार उपलब्ध कराने में मदद मिल सकती है। उन्होंने उपचार के दौरान नियमित चिकित्सकीय निगरानी के महत्व पर भी जोर दिया।
आगरा में पायलट प्रोजेक्ट के दौरान दर्ज 92 प्रतिशत उपचार सफलता दर इस पद्धति के परिणामों को दर्शाती है। अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि पात्र मरीजों की समय पर पहचान हो, उन्हें सही उपचार मिले और वे चिकित्सकीय सलाह के अनुसार दवाओं का पूरा कोर्स लें। इससे मरीजों को राहत देने के साथ टीबी नियंत्रण के प्रयासों को भी मजबूती मिल सकती है।
द बीट्स न्यूज नेटवर्क
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